सागर में समाना
सागर में समाना।।
खाई-खन्दक, पर्वत चीर फाड़ कर,
मिली सागर भीतर।।
राह में रोड़े रोक न पाए, आये पग पग पर,
मन नदी अटल-अडिग।।
चलती रही लक्ष्य पर, क्षय न होने दी खुद को,
सागर में समाना।।
समा ही गयी सागर में, सागर में मिल,
सागर हुई एकाकार।।
अब भिन्न नहीं हो सकती, मस्ती में मस्त,
आत्मा-परमात्मा मय।।
मन नदी का लक्ष्य अटल-अडिग,
सागर में समाना।।
पुष्पा गोयनका