Sunday, 17 May 2020

स्व रचित कविता - सागर में समाना

सागर में समाना

मन नदी का लक्ष्य अटल-अडिग,
सागर में समाना।।

खाई-खन्दक, पर्वत चीर फाड़ कर,
मिली सागर भीतर।।

राह में रोड़े रोक न पाए, आये पग पग पर,
मन नदी अटल-अडिग।।

चलती रही लक्ष्य पर, क्षय न होने दी खुद को,
सागर में समाना।।

समा ही गयी सागर में, सागर में मिल,
सागर हुई एकाकार।।

अब भिन्न नहीं हो सकती, मस्ती में मस्त,
आत्मा-परमात्मा मय।।

मन नदी का लक्ष्य अटल-अडिग,
सागर में समाना।।

पुष्पा गोयनका

Sunday, 8 March 2020

स्व रचित कविता - आनंद उत्सव

आनंद उत्सव

सब भूल जाओ, मूल में समा जाओ ।
जग शूल में, फूल बन खिल जाओ ।।

खेलो स्व आत्मा परमात्मा स्वाशों संग होली ।
पंच तत्त्व चोले भीतर सत्य आनंद रंग ।।

खेलो खेलो होली, सतरंग कभी न होवे बदरंग ।
मन प्रहलाद की जय जय, मन खेले आत्मा संग ।।

हर दिन हर पल, मन मनाये होली आनंद-उत्सव ।
ईश्वर स्वयं प्रकट, मन प्रहलाद की भक्ती देख ।।

सब भूल जाओ, मूल में समा जाओ ।
जग शूल में, फूल बन खिल जाओ ।।

पुष्पा गोयनका