Sunday, 17 May 2020

स्व रचित कविता - सागर में समाना

सागर में समाना

मन नदी का लक्ष्य अटल-अडिग,
सागर में समाना।।

खाई-खन्दक, पर्वत चीर फाड़ कर,
मिली सागर भीतर।।

राह में रोड़े रोक न पाए, आये पग पग पर,
मन नदी अटल-अडिग।।

चलती रही लक्ष्य पर, क्षय न होने दी खुद को,
सागर में समाना।।

समा ही गयी सागर में, सागर में मिल,
सागर हुई एकाकार।।

अब भिन्न नहीं हो सकती, मस्ती में मस्त,
आत्मा-परमात्मा मय।।

मन नदी का लक्ष्य अटल-अडिग,
सागर में समाना।।

पुष्पा गोयनका

10 comments:

Niket said...

Bohot sundar Nanima🙏

Unknown said...

Very nice Pushpaji 🙏

Prakaash Bhutoria said...

बहुत खूब .

winsome teen said...

Wooow naani 😬

Unknown said...

Very nice..Dil ko chu gay..

Unknown said...

बहुत सुंदर 👌👌👌👏👏👏

Learn Hindi - On Line Course said...

जय श्री राधे 🙏
वाह, उम्दा, अदभुत...बहुत बहुत बधाई....

Bharat Sharma said...

शब्दों का सुंदर एवं अर्थपूर्ण संयोजन🙏

Unknown said...

Manisha Tater Apne Bahut Sunder Kavita likhi hai Badhai ho Pushpaji

Unknown said...

Wah...ati sunder...bhaw bhini...